राजपूत अफीम के नशेड़ी और शराबी थे !
राजस्थान के गौरवशाली राजपूतों पर इससे अधिक संवेदनशील और निंदनीय आरोप और कुछ नही हो सकता। सबसे पहले कल्पना करें की एक जयमल मेड़तिया या पता चुड़ावत या कोई साधारण सेनानी राजपूत , अपनी प्रिय, अपनी पुत्री, अपनी मां के जीवित अंतिम संस्कार की चिता अपने ही हाथो से सजा रहा है।
केवल कल्पना करने से जब हमारे शरीर में ठंडा कंपन आ सकता है तो वास्तव में राजपूतों के नेतृत्व में सहस्त्रों महिलाओं ने जौहर कैसे किया होगा। कुछ क्षण के लिए क्या हम अपनी चेतना को उस काल में ले जा सकते हैं जब हिंदू पुरुष अपने परिवारों की चिता को अग्नि दे अपनी आंखों के सामने उन्हें जीवित जलते हुए देख रहे थे? कठोर से कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी इस भावना में अपना मानसिक संतुलन खो सकता था यदि हमारे पुरखे उसे हृदय विदारक परीक्षा की घड़ी में अफीम का सहारा लेते थे तो हमें उनका उपवास करना चाहिए या वंदन? अफीम के नशे में यदि हमारे पुरखे उसे असहनीय वेदना के परे जाकर शत्रु को हमारे मान मर्दन से वंचित कर रहे थे तो यह दैवीय कार्य था। जौहर के बाद राजपूत योद्धा शत्रु से युद्ध करने हेतु दुर्गा के द्वार खोलने से पहले एक दूसरे को पान में भी अमल अफीम दिया करते थे।
योद्धा स्वयं को मानसिक एवं शारीरिक रूप से सुन करने हेतु अफीम का प्रयोग करते थे ताकि वह निर्विचार होकर उस शत्रु से युद्ध कर पाए जो उनके परिवार और धर्म का नाश करने का एकमात्र उद्देश्य लेकर आया है।
लिखित इतिहास में हमें कहीं भी सामाजिक बुराई के रूप में अफीम की लत का एक उदाहरण तक नहीं मिलता है। राजस्थान के योद्धाओं में अफीम के सेवन का एक और कारण अफीम का पीड़ा नाशक प्रभाव था। मल्लेश्चो के साथ हुए अनगिनत संघर्षों एवं युद्ध तथा आश्चरोहण के परीक्षण के समय लगभग सभी योद्धाओं को छोटी-बड़ी चोटो का सामना करना पड़ता था । मेवाड़ के लड़े गए 100 से अधिक युद्धों के परिणाम स्वरुप महान महाराणा सांगा के शरीर पर लगभग 84 घाव थे।
योद्धाओं ने कई भीषण युद्ध में अपनी उंग हुईलियां हाथ पैर एवं विभिन्न अंग खोए हुए थे और ऐसे समय में जब उन्हें पीड़ा होती थी तो केवल अफीम ही उनके लिए एक औषधि स्वरूप थी जिसके कारण वह अपनी पीड़ा को कुछ घंटे के लिए दबा पाए थे। राजस्थान में अफीम विशुद्ध रूप से औषधीय उपयोग में अथवा विवाह इत्यादि उत्सव में उल्लास हेतु प्रयोग में लाई जाती थी और ऐसे में इस औषधि का व्यसन कहकर उपहास करना न केवल हमारे पुरखों के त्याग के प्रति हमारी अनभिज्ञता है वरन् यह भी दर्शाता है कि हम कितने कृत धन लोग हैं
धन्यवाद





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