“बेला का गौना” ने जगाई सामाजिक चेतना, तमसी गांव में उमड़ी अपार भीड़ और संस्कृति का संदेश
रामनवमी के पावन अवसर पर कुटुंबा थाना अंतर्गत जगदीशपुर पंचायत के तमसी गांव में 27, 28 और 29 मार्च तक तीन दिवसीय भव्य नाटक आयोजन हुआ, जिसमें अंतिम दिन 29 मार्च की रात्रि में “बेला का गौना” नाटक का मंचन किया गया। इस नाटक ने जहां लोगों का भरपूर मनोरंजन किया, वहीं समाज को एक गहरा और सकारात्मक संदेश भी दिया।
“बेला का गौना” केवल एक पारिवारिक राजसी कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की संवेदनाओं, रिश्तों की मर्यादा, बेटी के सम्मान, पारिवारिक जिम्मेदारी और सामाजिक एकता का आईना है। नाटक के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि बेटियां केवल बोझ नहीं होतीं, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा और संस्कार की पहचान होती हैं। विवाह और गौना जैसी परंपराओं में प्रेम, सम्मान, जिम्मेदारी और सामाजिक संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
नाटक में यह भी दिखाया गया कि दहेज, अहंकार, पारिवारिक विवाद और समाज में फैली गलत सोच रिश्तों को कमजोर कर सकती है, जबकि आपसी समझ, सम्मान और संस्कार परिवार और समाज को मजबूत बनाते हैं। “बेला का गौना” ने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि गांव की संस्कृति केवल परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्य भी छिपे होते हैं।
कार्यक्रम में भारी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति रही और जगदीश पंचायत सहित आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। तीन दिनों तक चले इस आयोजन में अपार भीड़ और उत्साह देखने को मिला। अंतिम दिन “बेला का गौना” के मंचन ने पूरे आयोजन को यादगार बना दिया।
कार्यक्रम में अमरेंद्र कुशवाहा के सर्वेश्रेष्ठ प्रदर्शन पर नवयुवक कला आयोजन समिति के सदस्यों के तरफ से सम्मानित भी किया गया, तथा सामाजिक कार्यकर्ता निखिल सिंह और शिक्षक सह पूर्व मुखिया प्रतिनिधि जयप्रकाश सिंह ने नाटक के लिए विशेष आर्थिक सहयोग किया जिसकी चर्चा समाज में चारों और है
कार्यक्रम का संचालन शिक्षक जयकुमार सिंह ने किया। आयोजन में नौजवान संघ के कमेटी अध्यक्ष मनीष सिंह, पूर्व मुखिया प्रतिनिधि सह शिक्षक जयप्रकाश सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता निखिल सिंह, अमिताभ सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता चमन सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय सिंह , अंजनी सिंह, गोल्डी सिंह, बंटी सिंह, रवि सिंह, पवन सिंह, प्रमोद सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता कृष्ण सिंह, वरीय नेता जितेंद्र सिंह और पंचायती राज से जुड़े कई ग्रामीण नेताओं की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही।
उपस्थित लोगों ने कहा कि गांवों में इस तरह के लोकनाट्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का काम करते हैं। आज के समय में जब लोग मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में खोते जा रहे हैं, तब “बेला का गौना” जैसे नाटक समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
गांव के बुजुर्गों ने कहा कि पहले गांवों में नौटंकी और लोकनाट्य की परंपरा समाज को जोड़ने का माध्यम हुआ करती थी और आज भी ऐसे आयोजन सामाजिक समरसता, भाईचारा और जागरूकता को बढ़ावा देते हैं। “बेला का गौना” ने यह साबित कर दिया कि लोक संस्कृति की ताकत आज भी समाज को सही दिशा देने में सक्षम है। बिहार के लोकनाट्य लंबे समय से सामाजिक संदेश, पारिवारिक मूल्यों और ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं को सामने लाने का माध्यम रहे हैं।



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