Saturday, 28 October 2023

किसानों का क्या लुटा जा रहा है ?

 क्या लुटा जा रहा है? 


याद कीजिए जब बरसात आते ही इन्हीं खेतों में दूर-दूर तक जल का जमाव होता है और फिर बिहन कबाङकर इन्हीं धान के खेतों में रोपनी होती है। इस वर्ष यह शायद आखिरी वर्ष है जब धान की रोपनी हुई है। जो भी प्रभावित खेत है उसमें शायद ही अगले वर्ष से प्रशासन खेती करने दें क्योंकि नवंबर दिसंबर में इनको काम लगाना है। हमारी सारी मांगों को प्रशासन ने सिरे से खारिज कर दिया है। अपनी निरंकुशता और तानाशाही में वह कुछ सुनने को तैयार नहीं है। लिहाजा हमलोगों ने भी कमर कस लिया है।



वो खेत जिसमें हमारे दादा-परदादा खेती करके जीवन-यापन करते रहें। जब अकाल का साल भी वही खेत हमारा सहारा रहा। जब कोई सरकार के नुमाइंदे हमें देखने न आएं, जब सङक न थी, बिजली न थी। उस वक्त वही खेत हमें दो जून की रोटी और चावल देती रही। सब्जी और दाल देती रही। उसको सरकार एक नोटिस देकर कब्जा करना चाहती है। हमसें रेट भी नहीं पुछना चाहती। हमारी सांस्कृतिक और ग्रामीण ताने-बाने को तहस-नहस करके रख देना चाहती है। कुछ गाँव के स्कूल और शमशान घाट एक्सप्रेसवे की जद में हैं जिसपर प्रशासन गुंगी और बहरी बनी हुई है। इनकी प्रशासनिक तानाशाही का आलम यह है कि ये किसी किसान से सीधे मुँह बात नहीं करना चाहते है, पूछने पर अपने भ्रष्ट रजिस्ट्री आॅफिस, भ्रष्ट और पुरातन प्रणाली में जकङे हुए 100 वर्ष पुराने रिकार्ड को सही मानने वाली भू-अर्जन विभाग के तानाशाह और निकृष्ट पदाधिकारियों का हवाला देते हुए किसानों के सभी मांगों और संवेदनाओं को एक झटके में अपने अहंकार का आवेग में खरिज कर देते हैं। इनका अपना काला कानून है जो अधतन(अपडेट) नहीं है। उसी काले कानून का हवाला देकर हमारी भूमि को यह छिनने की ताक में लगे हुए हैं।



पूर्व कृषि मंत्री सह विधान परिषद सदस्य सुधाकर सिंह ने एक बहुत अच्छी मांग रखी है कि क्यों न, बिहार सरकार के सरकारी भूमि के साथ भू-अर्जन में गए भूमि का अदला-बदली कर लिया जाए। सरकार तथा इसके निक्कमें और कर्तव्यहीन पदाधिकारी यह कभी नहीं होने देंगे। ये जानते हैं कि जमीन के बदले सरकारी जमीन देने से इन्हें भविष्य के भूमि अर्जन और कब्जें में भारी दिक्कत होगी। लिहाजा यह कभी इस बात को नहीं मानेंगे।


मित्रों। मैंने लगभग 5 एक्सप्रेसवे का बहुत बारीकी से अध्ययन किया है और आपको यह बता देना चाहता हूँ कि सभी एक्सप्रेसवे में पुनः औधोगिक इकाईयों को स्थापित करने के लिए भूमि ली गई है। हमारा वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेस वे भी इकोनामिक काॅरिडोर है जिसके कारण आने वाले दिनों में इसके आसपास की जमीनें खतरे में हैं।


किसान भाईयों। आदरणीय सतीश सिंह ने जैसा कि एनटीपीसी परियोजना का मुआवजा भेजा था उसके मुताबिक 2013 का रेट और अभी के रेट में कोई अंतर नहीं है। क्या महंगाई नहीं बढ़ी है? क्या रजिस्ट्री या एमवीआर का अपडेट न होना हमारी गलती है? फिर हमें बली का बकरा क्यों बनाया जा रहा है। सरकार की भ्रष्ट नीतियों और जङता भरी प्रणालियों ने सरकारी व्यवस्था को पंगु बना दिया है। इसके लिए हम कहीं से जिम्मेदार नहीं है। ये मौजूदा एमवीआर पर ही मुआवजा तय कर रहे हैं जो न तो अपडेट(अधतन) है और न ही न्यायसंगत।


मित्रों, आजकल एक्सेस कंट्रोल के नाम पर कई एक्सप्रेसवे में सर्विस रोड नहीं देने की प्रथा का सूत्रपात हुआ है जिससे सबसे ज्यादा नुकसान गाँवों के दोहर, पोखर, बाँध के आसपास के जमीनों का है। आखिर किसान कैसे अपना खेती सुचारू रूप से करेगा? आखिर ऐसे एक्सप्रेसवे का हमें क्या लाभ मिलेगा? आभास तो यही होता है कि यह एक्सप्रेसवे सिर्फ बङे-बङे उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाया जा रहा है।


दो बात इसमें और जोङना चाहता हूँ। एक   ग्रामीण सङक के किनारे की आवासीय जमीन का कृषि जमीन के तौर पर भुगतान के संबंध में। क्या आॅफिसर और कर्मचारी अंधे हैं जो उन्हें सङक के किनारे की जमीन का अता-पता नहीं है या फिर अपनी जिद्द और तानाशाही से वह ऐसे जमीन का वर्गीकरण सही से नहीं कर पाए हैं। आखिर हरियाणा भी तो इसी भारत में है वहाँ सङक के किनारे जमीनों को मुआवजा बढ़ाकर कैसे दिया जाता है!! क्या यह बिहार सरकार की घोर लापरवाही और कर्तव्यहीनता नहीं है?


दूसरी बात है मालिक-गैरमजरूआ को लेकर। क्या मालिक गैरमजरूआ जमीन का भुगतान होगा या नहीं! अगर होगा तो फिर इसमें देर क्यों किया जा रहा है? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं है? आखिर किसान इन चीजों का क्यों खामियाज़ा भुगते?


सवालों की संख्या लंबी है। जख्म गहरा और ताजा है। सवालों के जवाब पर प्रशासन लाठी और बंदूक के साथ काले कानून का सहारा लेना चाहती है। हमारे पास काले कानून के खिलाफ लङाई का तरीका सिर्फ आंदोलन ही है। न्यायालय सिर्फ बहलावा है। हमें सङक पर ही इस लङाई को लङना है। गिरफ्तारी देना है। सामने से प्रशासनिक गुंडों को ललकारना है। काले कानून के खिलाफ लङना है। भूख हङताल करना है। अनिश्चितकालिन धरना देना है। कभी भी इन सरकारी दलालों, सरकारी गुंडों, काले कानून के रखवालों के सामने घुटने नहीं टेकना है। यह हमारी सम्मान की लङाई है।


जय जवान, जय किसान


Friday, 27 October 2023

दिवाली क्यों मनाते है? दिवाली मनाने की भारत में क्या वजह है?

दिवाली 🪔

असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मा अमृतं गमय।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ इसका अर्थ ये है की असत्य से सत्य की ओर।अंधकार से प्रकाश की ओर।मृत्यु से अमरता की ओर।(हमें ले जाओ)

ॐ शांति शांति शांति।।

दिवाली का दूसरा नाम दीपोत्सव , दीपावली तथा प्रकाश पर्व के नाम से भी जानते हैं।इसे दीपों का त्योहार भी कहा जाता हैं। यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या ( अक्टूबर या नवंबर ) को मनाया जाता है और भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। आध्यात्मिक रूप से यह 'अन्धकार पर प्रकाश की विजय' को दर्शाता है। दिवाली के कई दिनों पहले से ही लोग अपने घरों की साफ सफाई करते है। यह धनतेरस से लेकर भाई दूज तक पांच दिन चलता है। दिवाली पर  लोग खिलौने, आभूषण, मिठाईयां तथा कपड़े की खरीदारी करते है। दिवाली के दिन लोग नए कपड़े पहनते है। लोग अपने घरों को सुंदर रंगोली ओर दीयों से सजाते है। हर घर में अलग अलग तरह के व्यंजन और पकवान बनाए जाते है। लोग एक दूसरे को दिवाली की शुभकामना देते हैं। यह त्योहार सब लोग मिल जुलकर मानते है। दिवाली स्वच्छता और प्रकाश का पर्व है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश की जीत को दर्शाता है। यह त्योहार सभी के जीवन में खुशी प्रदान करता हैं।


माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का हृदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है और असत्य का नाश होता है।

#diwali #dipawali #🪔

धन्यवाद